01
प्रारम्भिक शास्त्रीय हस्तक्षेप
महाराज जी के आरम्भिक लेखन का स्वर अत्यन्त स्पष्ट था—समकालीन प्रश्न का उत्तर मूल शास्त्र, तर्क और अविच्छिन्न परम्परा के भीतर से देना।
यह लेखन केवल प्रतिवाद नहीं था। संकीर्तन और वर्णाश्रम-मर्यादा से लेकर शांकर-सिद्धान्त, समन्वय और भगवत्-तत्त्व तक उसमें सकारात्मक, सुव्यवस्थित सिद्धान्त-स्थापना दिखाई देती है।

- 011938
संकीर्तन मीमांसा एवं वर्णाश्रममर्यादा
- 021939
शांकर सिद्धान्तों पर किये गये आक्षेपों का समाधान
- 031940
समन्वयसाम्राज्य संरक्षण
- 041940
श्रीभगवत्तत्त्व
02
वेद का स्वरूप और प्रामाण्य
वेद उनके चिन्तन में किसी ऐतिहासिक अवशेष की तरह नहीं, सनातन प्रमाण और अविच्छिन्न ज्ञान-परम्परा के रूप में उपस्थित है।
इन कृतियों को अलग-अलग शीर्षकों की तरह पढ़ना पर्याप्त नहीं। वे एक दीर्घ बौद्धिक साधना के क्रम हैं—वेद के स्वरूप से उसके प्रामाण्य, अहम् और परमार्थ के सम्बन्ध, तथा वेदार्थ के व्यापक उद्घाटन तक।
- 011959–60
वेद का स्वरूप और प्रामाण्य
- 021961
वेद प्रामाण्य मीमांसा
- 031962
अहमर्थ और परमार्थ सार
- 041969
वेद स्वरूप विमर्श
- 05प्रथम खण्ड 1979 · द्वितीय खण्ड 1980
वेदार्थ पारिजात
03
रामायण, भक्ति और श्रीविद्या
रामकथा का शास्त्रीय और दार्शनिक विवेचन, भक्ति के रस और तत्त्व, तथा भगवती त्रिपुरसुन्दरी की उपासना—ये सभी उनके वाङ्मय में एक ही सनातन साधना-दृष्टि के आयाम हैं।
यह विस्तार उनके दर्शन की अखण्डता प्रकट करता है। वेद-विमर्श, अद्वैत, भक्ति, रामायण और श्रीविद्या परस्पर असम्बद्ध विषय नहीं, एक-दूसरे को आलोकित करने वाली परम्पराएँ हैं।
- 01
भक्ति रसार्णव
- 021973
श्रीविद्यारत्नाकर
- 031977 · विमोचन 1979
रामायण मीमांसा
- 041979
श्री विद्यावारिवस्या
04
समाज, राज्य और आधुनिक विचारधाराएँ
आधुनिक समाज, कानून, अर्थ, राज्य और राजनीतिक विचारधाराओं का उनका परीक्षण शास्त्रीय भारतीय दृष्टि से हुआ। उन्होंने अपने समय के प्रश्नों से मुँह नहीं मोड़ा; उन्हें धर्म, प्रमाण और कर्तव्य की कसौटी पर रखा।
इन कृतियों को केवल तत्कालीन विवादों तक सीमित करना उनके महत्व को छोटा करना होगा। वे आज भी पूछती हैं कि मनुष्य, समाज और शासन की व्यवस्था किस सत्य और किस नैतिक उत्तरदायित्व पर आधारित हो।
- 011948 में प्रणयन · 1958 में प्रकाशन
मार्क्सवाद और रामराज्य
- 021949
संघर्ष और शान्ति
- 031949 के आसपास
हिन्दू कोडबिल प्रमाण की कसौटी पर
- 041973
चातुर्वर्ण्य संस्कृति विमर्श
- 051975
विचारपीयूष
- 061976
क्या सम्भोग से समाधि संभव
05
सन्मार्ग, सिद्धान्त और सार्वजनिक विचार
सन् 1939 से आरम्भ प्रकाशकीय प्रयत्नों ने शास्त्रीय विचार को व्यापक पाठक-समाज तक पहुँचाया। मासिक, साप्ताहिक और आगे दैनिक रूप में विकसित यह धारा उनके लेखन, धर्मसंघ और जन-जागरण के बीच सेतु बनी।
इस सार्वजनिक विचार-परम्परा में दर्शन और धर्मरक्षा के साथ समाज, राष्ट्र तथा समकालीन जीवन के प्रश्न भी निरन्तर उपस्थित रहे।
- 011939 से
सन्मार्ग
- 021939 से
सिद्धान्त