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वेद · दर्शन · भक्ति · समाज · राज्य

धर्मसम्राट महाराज जी का विशाल वाङ्मय

उनकी कृतियाँ वेद-प्रामाण्य से लेकर भक्ति, रामायण, श्रीविद्या, सामाजिक व्यवस्था, राजनीति और समकालीन विचारधाराओं तक फैली हैं। यह वाङ्मय किसी सूची का विषय नहीं, एक परस्पर जुड़ा शास्त्रीय अध्ययन-पथ है।

01

प्रारम्भिक शास्त्रीय हस्तक्षेप

महाराज जी के आरम्भिक लेखन का स्वर अत्यन्त स्पष्ट था—समकालीन प्रश्न का उत्तर मूल शास्त्र, तर्क और अविच्छिन्न परम्परा के भीतर से देना।

यह लेखन केवल प्रतिवाद नहीं था। संकीर्तन और वर्णाश्रम-मर्यादा से लेकर शांकर-सिद्धान्त, समन्वय और भगवत्-तत्त्व तक उसमें सकारात्मक, सुव्यवस्थित सिद्धान्त-स्थापना दिखाई देती है।

धर्मसम्राट स्वामी करपात्री जी महाराज का श्वेत-श्याम चित्र
धर्ममार्ग के प्रवर्तक और लोकमंगल के साधक
  • 011938

    संकीर्तन मीमांसा एवं वर्णाश्रममर्यादा

    संकीर्तन के शास्त्रीय अधिकार और वर्णाश्रम-मर्यादा का विवेचन।

  • 021939

    शांकर सिद्धान्तों पर किये गये आक्षेपों का समाधान

    शांकर-सिद्धान्त पर उठे आक्षेपों का शास्त्रीय समाधान।

  • 031940

    समन्वयसाम्राज्य संरक्षण

    समन्वय और धर्म-संरक्षण के व्यापक संकल्प की प्रस्तुति।

  • 041940

    श्रीभगवत्तत्त्व

    भगवत्-तत्त्व का विशद दार्शनिक विवेचन।

02

वेद का स्वरूप और प्रामाण्य

वेद उनके चिन्तन में किसी ऐतिहासिक अवशेष की तरह नहीं, सनातन प्रमाण और अविच्छिन्न ज्ञान-परम्परा के रूप में उपस्थित है।

इन कृतियों को अलग-अलग शीर्षकों की तरह पढ़ना पर्याप्त नहीं। वे एक दीर्घ बौद्धिक साधना के क्रम हैं—वेद के स्वरूप से उसके प्रामाण्य, अहम् और परमार्थ के सम्बन्ध, तथा वेदार्थ के व्यापक उद्घाटन तक।

  • 011959–60

    वेद का स्वरूप और प्रामाण्य

    दो खण्डों में वेद के स्वरूप और प्रमाणता का विस्तृत प्रतिपादन।

  • 021961

    वेद प्रामाण्य मीमांसा

    वेद-प्रामाण्य की मीमांसात्मक स्थापना।

  • 031962

    अहमर्थ और परमार्थ सार

    अहमर्थ और परमार्थ के दार्शनिक सम्बन्ध का विवेचन।

  • 041969

    वेद स्वरूप विमर्श

    वेद के स्वरूप पर केन्द्रित गहन विमर्श।

  • 05प्रथम खण्ड 1979 · द्वितीय खण्ड 1980

    वेदार्थ पारिजात

    वेदार्थ के व्यापक निरूपण का द्विखण्डीय बृहद् ग्रन्थ।

03

रामायण, भक्ति और श्रीविद्या

रामकथा का शास्त्रीय और दार्शनिक विवेचन, भक्ति के रस और तत्त्व, तथा भगवती त्रिपुरसुन्दरी की उपासना—ये सभी उनके वाङ्मय में एक ही सनातन साधना-दृष्टि के आयाम हैं।

यह विस्तार उनके दर्शन की अखण्डता प्रकट करता है। वेद-विमर्श, अद्वैत, भक्ति, रामायण और श्रीविद्या परस्पर असम्बद्ध विषय नहीं, एक-दूसरे को आलोकित करने वाली परम्पराएँ हैं।

  • 01

    भक्ति रसार्णव

    भक्ति के तत्त्व और रस पर प्रतिष्ठित कृति।

  • 021973

    श्रीविद्यारत्नाकर

    भगवती त्रिपुरसुन्दरी की उपासना का सांगोपांग तान्त्रिक विवेचन।

  • 031977 · विमोचन 1979

    रामायण मीमांसा

    रामकथा के शास्त्रीय, ऐतिहासिक और दार्शनिक प्रश्नों का बृहद् विवेचन।

  • 041979

    श्री विद्यावारिवस्या

    श्रीविद्या-उपासना से सम्बद्ध संस्कृत ग्रन्थ।

04

समाज, राज्य और आधुनिक विचारधाराएँ

आधुनिक समाज, कानून, अर्थ, राज्य और राजनीतिक विचारधाराओं का उनका परीक्षण शास्त्रीय भारतीय दृष्टि से हुआ। उन्होंने अपने समय के प्रश्नों से मुँह नहीं मोड़ा; उन्हें धर्म, प्रमाण और कर्तव्य की कसौटी पर रखा।

इन कृतियों को केवल तत्कालीन विवादों तक सीमित करना उनके महत्व को छोटा करना होगा। वे आज भी पूछती हैं कि मनुष्य, समाज और शासन की व्यवस्था किस सत्य और किस नैतिक उत्तरदायित्व पर आधारित हो।

  • 011948 में प्रणयन · 1958 में प्रकाशन

    मार्क्सवाद और रामराज्य

    मार्क्सवादी विचार और धर्माधिष्ठित रामराज्य का दार्शनिक-राजनीतिक परीक्षण।

  • 021949

    संघर्ष और शान्ति

    संघर्ष, शान्ति और धर्माधारित सार्वजनिक जीवन पर चिन्तन।

  • 031949 के आसपास

    हिन्दू कोडबिल प्रमाण की कसौटी पर

    हिन्दू कोड बिल की धाराओं का शास्त्रीय भारतीय परिप्रेक्ष्य में परीक्षण।

  • 041973

    चातुर्वर्ण्य संस्कृति विमर्श

    चातुर्वर्ण्य और संस्कृति के शास्त्रीय आधार पर विमर्श।

  • 051975

    विचारपीयूष

    दार्शनिक और राजनीतिक विषयों पर बृहद् चिन्तन।

  • 061976

    क्या सम्भोग से समाधि संभव

    समाधि और साधना के विषय में एक समकालीन मत का शास्त्रीय खण्डन।

05

सन्मार्ग, सिद्धान्त और सार्वजनिक विचार

सन् 1939 से आरम्भ प्रकाशकीय प्रयत्नों ने शास्त्रीय विचार को व्यापक पाठक-समाज तक पहुँचाया। मासिक, साप्ताहिक और आगे दैनिक रूप में विकसित यह धारा उनके लेखन, धर्मसंघ और जन-जागरण के बीच सेतु बनी।

इस सार्वजनिक विचार-परम्परा में दर्शन और धर्मरक्षा के साथ समाज, राष्ट्र तथा समकालीन जीवन के प्रश्न भी निरन्तर उपस्थित रहे।

  • 011939 से

    सन्मार्ग

    मासिक से साप्ताहिक और आगे दैनिक रूप में विकसित सार्वजनिक विचार-परम्परा।

  • 021939 से

    सिद्धान्त

    शास्त्रीय सिद्धान्त और समकालीन प्रश्नों को व्यापक पाठक-समाज तक ले जाने वाला विचारपत्र।