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धर्म संघ की स्थापना और उद्देश्य
सन् 1940 में धर्म संघ की स्थापना ने धर्मसम्राट महाराज जी की भारतव्यापी पदयात्राओं, धर्म-सम्मेलनों, शास्त्र-चर्चा और जन-जागरण को स्थायी संस्थागत आधार दिया।
इसका मूल उद्देश्य धर्म को सतत आचरण, शिक्षा, साधना और सामाजिक उत्तरदायित्व के रूप में प्रतिष्ठित करना था—ऐसी व्यवस्था जिसमें शास्त्र और सेवा परस्पर पूरक हों।
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वेद और संस्कृत शिक्षा
वेद-अध्ययन, संस्कृत शिक्षा, गुरु-शिष्य अध्यापन और शास्त्रीय संवाद धर्म संघ की सेवा-दृष्टि के प्रमुख अंग हैं। धर्मसम्राट महाराज जी स्वयं चातुर्मास्य में यतियों, विद्वानों और विद्यार्थियों को विविध शास्त्र पढ़ाते थे।
शिक्षा का लक्ष्य केवल सूचना देना नहीं, बल्कि शुद्ध उच्चारण, अर्थबोध, अनुशासन, साधना और उत्तरदायी जीवन-दृष्टि को साथ लेकर चलना है।
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अनुष्ठान, आराधना और आश्रम-जीवन
जप, स्तोत्र-पाठ, देव-आराधना, यज्ञ-अनुष्ठान और पर्व-परम्परा धर्म के अनुभूतिपरक पक्ष को सतत बनाए रखते हैं। आश्रम-जीवन इन साधनाओं को अनुशासन, आतिथ्य और सामूहिक उत्तरदायित्व से जोड़ता है।
करपात्री धाम और प्रमुख केन्द्रों का सार्वजनिक परिचय इसी सतत साधना और सेवा की दिशा में दिया गया है; वर्तमान कार्यक्रमों और आगमन के लिए अधिकृत सम्पर्क से पुष्टि अपेक्षित है।
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ग्रन्थ-संरक्षण, गौ-सेवा और धर्मरक्षा
धर्मसम्राट महाराज जी का विशाल वाङ्मय और उनसे जुड़ी प्रकाशन-परम्परा शास्त्रीय ज्ञान को भावी पीढ़ियों तक पहुँचाने का उत्तरदायित्व देती है। ग्रन्थों का संरक्षण, सही परिचय और अध्ययन इसी उत्तरदायित्व के अंग हैं।
गौ-सेवा, धर्मरक्षा, श्रद्धालुओं का मार्गदर्शन और तथ्य-सुधार भी सेवा की उसी व्यापक भावना से जुड़े हैं जिसमें सत्य, करुणा और मर्यादा एक साथ चलें।
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सेवा, सहयोग और आगमन का अधिकृत माध्यम
किसी वर्तमान कार्यक्रम, केन्द्र-विशेष की सेवा, आगमन, सार्वजनिक आयोजन अथवा संस्थागत सहयोग के विषय में सही जानकारी के लिए सम्पर्क एवं आगमन पृष्ठ पर दिए अधिकृत प्रथम सम्पर्क का उपयोग करें।
इस प्रकार धर्म संघ एवं सेवा का यह पृष्ठ उद्देश्य और कार्य-दिशा बताता है; चार प्रमुख केन्द्रों का भौगोलिक परिचय और वर्तमान आगमन-सूचना अपने पृथक, स्पष्ट मार्गों से उपलब्ध है।