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हरनारायण से स्वामी हरिहरानन्द सरस्वती
श्रावण शुक्ल द्वितीया, रविवार, सन् 1907 में श्री हरनारायण के रूप में जन्मे महाराज जी ने अल्पायु में ही वैराग्य का मार्ग ग्रहण किया। सन् 1926 में गृहत्याग के बाद वे प्रयाग पहुँचे और स्वामी ब्रह्मानन्द सरस्वती जी महाराज के मार्गदर्शन में नैष्ठिक ब्रह्मचर्य-व्रत ग्रहण कर हरिहरचैतन्य कहलाए।
नर्वर में षड्दर्शनाचार्य स्वामी विश्वेश्वर आश्रम जी महाराज के सान्निध्य में उन्होंने आस्तिक दर्शनों का गहन अध्ययन किया। सन् 1931–32 में संन्यास-दीक्षा के पश्चात उनका नाम स्वामी हरिहरानन्द सरस्वती हुआ। ज्ञान, त्याग और अनुशासन की यही संयुक्त साधना उनके समूचे जीवन का आधार बनी।

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तपस्या से लोकसंग्रह का संकल्प
गंगा-तट की साधना और ऋषिकेश की गुफा में गहन ध्यान उनके जीवन का निर्णायक अध्याय था। आत्मसाक्षात्कार की साधना ने उन्हें संसार से विमुख होकर मौन रहने की ओर नहीं, बल्कि वैदिक सनातन धर्म की सेवा और जन-जागरण की ओर प्रवृत्त किया।
इसीलिए उनका सार्वजनिक जीवन आध्यात्मिक जीवन से पृथक नहीं था। पदयात्रा, शास्त्रार्थ, शिक्षण, लेखन, धर्म-सम्मेलन और समाज के प्रश्नों पर उनका हस्तक्षेप—ये सब उसी साधना के लोकसंग्रह-रूप थे।

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‘करपात्री’—त्याग से प्रतिष्ठित नाम
परमहंस अवस्था में वे अत्यल्प वस्त्र और आवश्यकताओं के साथ विचरण करते थे। भोजन के लिए अपने कर को ही पात्र बनाने के कारण ‘करपात्री’ नाम लोकप्रसिद्ध हुआ—कर अर्थात हाथ और पात्र अर्थात भोजन-पात्र।
यह केवल नामकरण का प्रसंग नहीं था। करपात्री नाम उनके अपरिग्रह, सरलता और उस जीवन-दृष्टि का प्रतीक बना जिसमें व्यक्तिगत संचय का त्याग करते हुए समस्त शक्ति धर्म और लोककल्याण को समर्पित थी।

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शास्त्रज्ञ संत
महाराज जी की विद्वत्ता केवल पाण्डित्य-प्रदर्शन नहीं थी। वेद, वेदान्त, मीमांसा, न्याय, धर्मशास्त्र, भक्ति और तन्त्र सहित अनेक शास्त्रीय धाराओं पर उनका अधिकार साधना, अध्ययन और अध्यापन से पुष्ट था। चातुर्मास्य में वे यतियों, विद्वानों, ब्राह्मणों और विद्यार्थियों को प्रस्थानत्रयी, मीमांसा, न्याय, तन्त्र और वेद पढ़ाते थे।
उनके लिए शास्त्र जीवन का मार्गदर्शक प्रमाण था। श्रुति, युक्ति और अनुभूति के सामंजस्य में वे धर्म-दर्शन को समझते और समझाते थे; इसलिए उनका चिन्तन केवल मठ या कक्षा तक सीमित न रहकर व्यक्ति, परिवार, समाज और राज्य तक विस्तृत हुआ।

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धर्म संघ और भारतव्यापी जागरण
सन् 1932 से उन्होंने भारतवर्ष में व्यापक पदयात्राएँ कीं। ग्राम-ग्राम और नगर-नगर में आचार्यों, विद्वानों, संतों और जनसमुदाय से संवाद करते हुए उन्होंने धर्मानुष्ठान, शास्त्र-चर्चा, नाम-संकीर्तन और संगठन के माध्यम से आध्यात्मिक चेतना जगाई।
सन् 1940 में धर्म संघ की स्थापना ने इस अखण्ड यात्रा को संस्थागत स्वरूप दिया। धर्म-सम्मेलन, सर्ववैदिक शाखा सम्मेलन, संस्कृत शिक्षण, विद्यालय, यज्ञ-अनुष्ठान और देशव्यापी शाखाएँ उनके संकल्प के विविध रूप बने। उन्होंने धर्म को केवल निजी आस्था नहीं, शिक्षा, संस्कृति और सार्वजनिक उत्तरदायित्व की सतत व्यवस्था के रूप में देखा।

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वाङ्मय, विचार और धर्मरक्षा
‘संकीर्तन मीमांसा एवं वर्णाश्रम मर्यादा’, ‘भगवत्तत्त्व’, ‘मार्क्सवाद और रामराज्य’, ‘वेद का स्वरूप और प्रामाण्य’, ‘वेद प्रामाण्य मीमांसा’, ‘वेद स्वरूप विमर्श’, ‘श्रीविद्यारत्नाकर’, ‘विचारपीयूष’, ‘रामायण मीमांसा’ और ‘वेदार्थ पारिजात’ जैसी कृतियाँ उनके व्यापक शास्त्रीय और सामाजिक चिन्तन का परिचय देती हैं।
‘सन्मार्ग’ और ‘सिद्धान्त’ जैसे प्रकाशकीय उपक्रमों से उन्होंने विचार को तत्कालीन सार्वजनिक जीवन तक पहुँचाया। हिन्दू कोड बिल पर शास्त्रीय समीक्षा, गो-रक्षा के लिए अहिंसक संघर्ष, मंदिर-मर्यादा की रक्षा और धर्मसापेक्ष शासन की स्थापना का आग्रह उनके लिए अलग-अलग अभियान नहीं, धर्म की समग्र दृष्टि के अंग थे।

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काशी-निष्ठा और निष्काम कर्मयोग
काशी उनके लिए भगवान् विश्वनाथ की आराधना, चातुर्मास्य, जप, शास्त्र-सेवा और तीर्थ-महिमा की अविच्छिन्न भूमि थी। फिर भी उनकी धाम-निष्ठा काशी तक सीमित नहीं थी—अयोध्या, वृन्दावन, कुरुक्षेत्र, प्रयाग, उज्जैन और हरिद्वार के पर्वों और तीर्थ-परम्पराओं में उनका गहरा भाव था।
जप, स्तोत्र-पाठ, देव-आराधना, अध्यापन और अनवरत सार्वजनिक कर्म उनके जीवन में एक-दूसरे के विरोधी नहीं थे। फलासक्ति और अहंकार से रहित होकर भी पूर्ण उत्साह से वैदिक धर्म-संस्कृति के लिए कर्म करना उनके जीवन की सक्रिय कर्मयोग-शिक्षा थी।

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महाप्रयाण और अविच्छिन्न प्रभाव
7 फरवरी 1982 को गंगा-स्नान के पश्चात शिव-नाम का उच्चारण करते हुए धर्मसम्राट महाराज जी करपात्री धाम, काशी स्थित वेदानुसन्धान केन्द्र में ब्रह्मलीन हुए। 9 फरवरी को केदार घाट पर माँ गंगा की गोद में जगद्गुरु शंकराचार्य पुरी पीठाधीश्वर स्वामी निरंजन देव तीर्थ जी महाराज ने पाषाण-पेटिका में जल-समाधि की पावन सेवा सम्पन्न की।
उनकी स्मृति केवल अतीत का गौरव नहीं है। गुरु-शिष्य परम्परा, अखिल भारतीय धर्म संघ, शास्त्र-अध्ययन, ग्रन्थ-संरक्षण, संस्कृत और वेद-शिक्षा, धर्मरक्षा और सेवा में उनका संकल्प आज भी प्रवाहित है। उन्हें स्मरण करने का अर्थ उनके ज्ञान, मर्यादा और लोकमंगल के आदर्श को जीवन में धारण करना है।
